MOTILAL BANARSIDASS PUBLISHING HOUSE (MLBD) SINCE 1903

प्राकृत व्याकरण: द्वितीय पाद (Prakrit Vyakarana: Dwitya Paad)

Binding
ISBN: 9789368537380, 9368537380
Regular price ₹ 450.00
Categories: Jainism, MLBD New Releases
Tags: Jainism

प्रस्तुत ग्रंथ में प्राकृत व्याकरण के द्वितीय पाद का विश्लेषण है। सूत्र, उसकी वृत्ति और शब्द साधनिका के साथ-साथ शोधपूर्ण टिप्पणियों और सन्दर्भ का स्पष्ट उल्लेख होने से ग्रंथ पूर्णतः शोचपूर्ण हो गया है। इसकी खास बात यह भी है कि प्राकृत शब्दों की सिद्धि में अनेक सूत्र संस्कृत व्याकरण (सिद्ध-हेम शब्दानुशासन) से भी प्रयुक्त हुए हैं। यहां उन सूत्रों का उल्लेख वृत्ति सहित करके ग्रंथ की उपयोगिता को बढ़ाया गया है। इससे पाठक गण व्यापक रूप से पाठ को समझ सकेंगे। प्राकृत व्याकरण वस्तुतः 'सिद्ध-हेम शब्दानुशासन' के अष्टम् अध्याय का ही नाम है। अतः यह स्वाभाविक है कि प्रारंभिक सात अध्याय जिनमें संस्कृत व्याकरण के नियम उल्लिखित हैं, की नींव पर यह व्याकरण भवन स्थापित है। अतः इसके सम्यक बोध हेतु प्रारम्भिक सात अध्यायों का ज्ञान भी आवश्यक हो जाता है। पूर्ण अध्यायों का सही, कम से कम उन सूत्रों का ज्ञान तो अवश्य ही होना चाहिए, जो शब्द-सिद्धि में प्रयुक्त हुए हों। इस आवश्यकता को प्रस्तुत ग्रंथ स्पष्टतः पूर्ण करता है।

शब्दों में होने वाले प्रत्येक परिवर्तन को सूत्र सहित स्पष्ट करके वृत्ति में भी जहाँ संशोधन की जरूरत महसूस हुई वहां अपनी बात स्पष्ट रूप से रखी गई है। इस तरह यह ग्रंथ मात्र व्याख्या नहीं अपितु शोधपूर्ण व्याख्या ग्रंथ है। अतः साधिकार यह कहा जा सकता है कि प्राकृत भाषा, व्याकरण और साहित्य के जिज्ञासुओं के लिए यह सर्वाधिक सरल, सटीक, उपयोगी और संग्रहणीय ग्रंथ होगा।

इसके सम्पादक आचार्य डॉ० पद्द्मराज स्वामी जी महाराज 'सादा जीवन, उच्च विचार' के आदर्श को जीवन्त करने वाले सरलता के साथ विद्वत्ता का समायोजन करते हुए विषय को प्रस्तुत करने वाले विरले सन्त हैं। आपकी वक्तृत्व-कला और लेखनशैली में प्रांजलता, सरलता, विषय की पूर्ण गहराई और गांभीर्य का संगम स्पष्ट देखा जा सकता है। इस तथ्य का दर्शन आपकी पूर्व प्रकाशित पुस्तकों 'अन्तकृद्दशांग सूत्र का भाषा-वैज्ञानिक विश्लेषण, प्राकृत व्याकरण, गंतव्य की ओर, सुंदरकांड' आदि में बखूबी किया जा सकता है। आप सृजनशील साहित्यकार होने के साथ-साथ ज्योतिषाचार्य भी हैं। जन्म कुण्डली लेखन, वाचन, विश्लेषण करने के साथ प्रत्येक समस्या का ज्योतिषीय सरल समाधान देना आदि आपके रुचिकर कार्य हैं। आपने अपने आश्रम का नाम ही 'ज्योतिष गुरुकुल' रखा है। प्राकृत भाषा के साथ ज्योतिष विद्या का भी प्रशिक्षण आप द्वारा प्रदान किया जाता है।