डॉ. नरेश त्यागी की पुस्तक सततता (सस्टेनेबिलिटी) पर एक गहन और अनिवार्य खोज है, जो उनके व्यक्तिगत अनुभवों की गहराई में उतरते हुए इस विषय के गूढ़ पहलुओं को उजागर करती है। यह सतत प्रथाओं की सामूहिक जिम्मेदारी को रेखांकित करती है और उनके विकास को प्राचीन काल से लेकर वर्तमान तक की यात्रा में प्रस्तुत करती है। सतत प्रथाओं के सबसे सूझबूझ भरे विश्लेषणों में से एक होने के नाते, यह पुस्तक सततता के इस विषय पर मूल्यवान टिप्पणियाँ और दूरदर्शी दृष्टिकोण प्रदान करती है। -कार्तिकेय साराभाई, पद्मश्री (2012) संस्थापक एवं निदेशक, पर्यावरण शिक्षा केंद्र (सी ई ई)
मैं नरेश को लगभग दो दशकों से जानता हूँ और उनके अभिनव एवं भविष्यद्रष्टा सोच का साक्षी रहा हूँ, जो मजबूत मूलभूत सिद्धांतों पर आधारित है। उनकी अद्भुत पुस्तक इस क्षेत्र में सबसे नवाचारी कृतियों में से एक के रूप में उभरती है, जो प्राचीन भारतीय सततता प्रथाओं पर किए गए शोध से लेकर समकालीन वैश्विक प्रवृत्तियों तक की अंतर्दृष्टियों को समाहित करती है। इनकी सुंदरता से रची गई प्रस्तुति और गहन शिक्षाएँ निश्चित रूप से लाखों लोगों को सतत विकास की दिशा में प्रेरित करेंगी। - आशीष दीक्षित, निदेशक, आदित्य बिड़ला मैनेजमेंट कॉर्पोरेशन लिमिटेड
डॉ. नरेश त्यागी की सततता पर दुर्लभ पुस्तक परंपरा और आधुनिकता को कुशलतापूर्वक समाहित करती है और अंतर्दृष्टि और जीवन की ऐसी शिक्षा प्रदान करती है जो विचारोत्तेजक और प्रासंगिक दोनों हैं। आप सावधानीपूर्वक चुने गए विषयों और विषयवस्तु की सराहना करेंगे जो हमें दुनिया को सतत और समावेशी विकास के लिए एक बेहतर स्थान बनाने की जिम्मेदारी लेने के लिए प्रेरित करते हैं। -डॉ. मदन मोहन सेठी, महावाणिज्यदूत, भारतीय महावाणिज्य दूतावास, हो ची मिन्ह सिटी, वियतनाम
सवतता के क्षेत्र में एक प्रतिष्ठित विद्वान, डॉ. नरेश त्यागी, इस बात का गहन अन्वेषण प्रस्तुत करते हैं कि कैसे भारत न सिर्फ एक स्थायी भविष्य की ओर अग्रसर हो रहा है, बल्कि स्थिरता के अपने प्राचीन सिद्धांतों से भी जुड़ रहा है। सूक्ष्म विद्वत्तापूर्ण विश्लेषण के माध्यम से, वे प्रकृति के साथ एक स्थायी सामंजस्य के लिए भारत की खोज की पड़ताल करते हैं और प्राचीन ज्ञान को आधुनिक प्रथाओं के साथ सहजता से मिलाते हैं। - रोहित कंसल, अतिरिक्त सचिव, वस्त्र मंत्रालय, भारत सरकार
वर्तमान कृति उस सहज स्वीकृति पर प्रश्न उठाती है जो हम पश्चिमी विज्ञान प्रधान समुदाय को देते हैं, एक ऐसा समुदाय जो यह तय करने की शक्ति रखता है कि कौन-सा ज्ञान मान्य है और किसे आगे बढ़ाया जाना चाहिए। डॉ. त्यागी सततता के रहस्यों को उस कालातीत भारतीय परंपरा में खोजते हैं, जो पिछले 3000 वर्षों से स्वदेशी ज्ञान में संजोई गई है। वे ऐसे लचीले पारिस्थितिकी तंत्रों को पुर्नस्थापित करने को बढ़ावा देते हैं जो सांस्कृतिक रूप से महत्वपूर्ण खाद्य पदार्थों, औषधियों, वनस्पतियों, भूमि और जल प्रबंधन, हरित तकनीकों और ग्रामीण अर्थव्यवस्थाओं का समर्थन करते हैं। लेखक भारत की समृद्ध विरासत 'मानव-प्रकृति सहजीवन' को उजागर करने में सफल होते हैं, जो आधुनिक विश्व के लिए पारिस्थितिकीय सततता में आज भी शिक्षाएँ प्रदान करती है। - प्रो. अन्विता अब्धी, पद्मश्री (2013) सहायक प्रोफेसर, साइमन फ्रेजर विश्वविद्यालय, ब्रिटिश कोलंबिया, बैंकूवर, कनाडा