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Chetna-Vikhandan: Manviya Dharm Ke Hras Se Samuhik Vighatan Tak (चेतना-विखंडन: मानवीय धर्म के ह्रास से सामूहिक विघटन तक)

New arrival
Binding
ISBN: 9789377706579 , 9377706572
Regular price ₹ 450.00

एक आमंत्रण... स्वयं को देखने का

हर विखंडन विनाश की कहानी नहीं होता; कभी-कभी वही समग्रता की खोज का पहला संकेत होता है।"" मनुष्य ने सत्य की खोज की, धर्म और दर्शन रचे, नैतिक मूल्य विकसित किए और सभ्यताएँ बनाई। फिर भी उसी मानव इतिहास में हिंसा, कट्टरता, प्रभुत्व, विभाजन और विघटन बार-बार लौटते रहे। तो प्रश्न केवल यह नहीं कि संसार में इतना विघटन क्यों है? प्रश्न इससे अधिक गहरा है- वह चेतना कैसी है, जिसके माध्यम से मनुष्य स्वयं को, दूसरे को और संसार को देखता है?

चेतना-विखंडन "इसी मूल प्रश्न की दार्शनिक खोज है। यह पहचान से तादात्म्य, तादात्म्य से सामूहिक पहचान, सामूहिक श्रेष्ठताबोध, प्रभुत्व और ध्रुवीकरण की ओर बढ़ते हुए व्यापक सामाजिक एवं सभ्यतागत विघटन तक की संभावित यात्रा को समझने का प्रयास करती है। लेकिन यह पुस्तक केवल दूसरों के विखंडन को पहचानने के लिए नहीं है। यह आपको उस दृष्टि की ओर लौटाती है, जिसके माध्यम से आप संसार को देखते हैं। क्योंकि" जिस विखंडन को हम संसार में देखते हैं, उसकी एक सम्भावित शुरुआत हमारी अपनी चेतना में भी हो सकती है।

यदि यह प्रश्न आपको भीतर तक ठहरा देता है- "क्या मैं भी उस विखंडन से पूरी तरह मुक्त हूँ, जिसे मैं दूसरों में पहचानता हूँ?" तो यह पुस्तक आपके लिए है।